धार्मिक ट्रस्ट की संपत्तियों और धन के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामले में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों को शुरुआती स्तर पर दबाया नहीं जा सकता।
अदालत ने डेरा ट्रस्ट में कथित गबन और धोखाधड़ी के मामले में दर्ज एफआइआर रद करने से इनकार करते हुए कहा कि आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला अदालत नहीं बल्कि निष्पक्ष जांच करेगी।
मामला जींद जिले के उचाना स्थित डेरा समाध (आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी गणेशनंद महाराज धर्मार्थ ट्रस्ट) से जुड़ा है। आरोप है कि ट्रस्ट की संपत्तियों, आय और वित्तीय लेन-देन में भारी अनियमितताएं हुईं और ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों ने विश्वास का दुरुपयोग कर धन और संपत्ति में गड़बड़ी की।
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से एफआइआर और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही रद करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि मामला आपराधिक नहीं है और उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाए गए हैं। हालांकि अदालत इस दलील से सहमत नहीं हुई।
न्यायमूर्ति एचएस ग्रेवाल ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद आरोपों को इस स्तर पर पूरी तरह झूठा नहीं माना जा सकता। शिकायत में लगाए गए आरोपों की सच्चाई, दस्तावेजों की वैधता और धन के इस्तेमाल से जुड़े प्रश्न जांच का विषय हैं। ऐसे विवादित तथ्यों का फैसला एफआइआर रद करने की कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि एफआइआर रद करना एक अपवादात्मक शक्ति है, जिसका प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाता है जहां प्रथम दृष्टया कोई अपराध ही न बनता हो। हाईकोर्ट ने न केवल याचिका खारिज कर दी, बल्कि जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि मामले की जांच में अनावश्यक देरी न की जाए और जल्द से जल्द तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचा जाए।
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